ho gaye akele

ये शीश किसी के सामने झुके न झुके,

मोबाइल के स्क्रीन पर जरूर झुकता है।

जिंदगी के हार्मोनीयम पर,प्रेम स्वर की धुन पर,

ये उंगलियाँ थिरके न ठीके, कंप्यूटर के कीपेड पर घंटों थिरकता है।

ये बेज़ुबान सेवक, रात दिन हमारी गुलामी करते,

बदले में नहीं हमसे कोई उम्मीद रखते।

सच तो ये है कि,

हम एक दूसरे पर शासन तो करना जानते है,

पर नहीं जानते दिल जीतना,

इसलिये धीरे-धीरे एक दूसरे से दूर, बहुत दूर

चले जाते इतना।

जहाँ न कोई उम्मीद हो, न कोई वादे

शांत खामोश सी दुनिया के, हम ही शहज़ादे,

एक नई दुनिया अपनी शर्तों पर बसाते,

जहाँ मशीनी उपकरणों से अपना मन बहलाते।

कल तक थे रिश्तों के मेले,

आज हो गये बिल्कुल अकेले।

यहाँ न राग है न द्वेष है,

बस जीवन के बेजान से पल ही शेष है।

गुमनाम सी जिंदगी में ढूंढ रहे अपनी पहचान,

जीवन नदी में बिन प्रेम नय्या के

डूब रहे हम अंजान

सुर ताल के अभाव में बेसुरे रह जाते

ये जीवन गान।